Wednesday, December 4, 2013

पंथ होने दो अपरिचित Mahadevi Verma



पंथ होने दो अपरिचित ( Panth hone do Aparichit )

पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला!

और होंगे चरण हारे,                
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!

दूसरी होगी कहानी                
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्यार विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!

हास का मधु-दूत भेजो,                
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!

- महादेवी वर्मा

Monday, November 25, 2013

Avatar - Ved Vyas

कवि - वेद व्यास

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवानि युगे युगे ॥
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Yada yada hi dharmasya glanir bhavati bharata|
Abhyutthanam adharmasya tadatmanam srjamyaham||

Paritranaya saadhunam vinashaya cha dushkrrtam |
Dharm sansthapnarthaya sambhavani yuge yuge ||
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Hindi Translation

Jab Jab hogi dharam ki haani, badhenge asur adharm abhimani,


Tab tab prabhu manushya ka sharir leke saare kasht khatam karenge aur saari peeda har lenge.